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80 के दौर में सेट 'बबल गम' कहानी है 14 साल के वेदान्त की जिसकी अच्छी भली जिंदगी पर तब ग्रहण लग जाता है जब बोलने और सुनने से लाचार उसका बड़ा भाई विदुर छुट्टियां मनाने होस्टल से घर आ जाता है। यूं भी वेदान्त उसकी गर्लफ्रेंड जेनी पर डोरे डाल रहे रतन से परेशान है। ऊपर से बड़े भाई को संभालने की ज़िम्मेदारी आ पड़ी है सो अलग। मां-बाप की सहानुभूति भी अपाहिज भाई से है। लेकिन धीरे-धीरे वेदान्त को अहसास होता है कि जिस अपाहिज भाई से वो बात-बात पर मुकाबला करता है उसे राह का कांटा समझता है वही भाई उसे कई मुसीबतों से बचाता है उसकी लव लाइफ को फूलों से भर देता है। डायरेक्टर संजीवन लाल की 'बबल गम' ना सिर्फ टीनेजर्स के रोमांस उनकी प्रतिद्वंदिता पर है बल्कि इस उम्र में उन्हें समझने और संभालने के मां-बाप के अनुभवों पर भी है। उड़ान के बाद जमशेदपुर के टीनेजर्स पर बनी ये फिल्म स्लो ज़रूर है लेकिन आखिरी के आधे घंटे आपको रोमांच और ऊंचे जज्बात से भर देंगे।
सोचिए। फिल्म में अपाहिज भाई का रोल कर रहे सोहैल लखानी सचमुच बोल और सुन नहीं सकते लेकिन उन्होंने कमाल की एक्टिंग की। उनके साथ फिल्म करने के लिए पूरी फिल्म टीम ने साइन लेंग्वेज सीखी। सूरज देलज़ाद हिवाले, अपूर्व अरोड़ा, तनवी आज़मी और सचिन खेड़ेकर की बेहतरीन एक्टिंग। जरूर देखिए 'बबल गम' बस इतना ध्यान रखिए कि आपको ग्लैमर मसाला और फास्ट पेस फिल्म नहीं मिलेगी। बस अच्छी फिल्म ज़रूर मिलेगी। 'बबल गम' के लिए मेरी रेटिंग है 3 स्टार।
सोचिए। फिल्म में अपाहिज भाई का रोल कर रहे सोहैल लखानी सचमुच बोल और सुन नहीं सकते लेकिन उन्होंने कमाल की एक्टिंग की। उनके साथ फिल्म करने के लिए पूरी फिल्म टीम ने साइन लेंग्वेज सीखी। सूरज देलज़ाद हिवाले, अपूर्व अरोड़ा, तनवी आज़मी और सचिन खेड़ेकर की बेहतरीन एक्टिंग। जरूर देखिए 'बबल गम' बस इतना ध्यान रखिए कि आपको ग्लैमर मसाला और फास्ट पेस फिल्म नहीं मिलेगी। बस अच्छी फिल्म ज़रूर मिलेगी। 'बबल गम' के लिए मेरी रेटिंग है 3 स्टार।
شنبه هشتم مرداد ۱۳۹۰ | 10:51
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